Thursday, January 9, 2020

बस एक दिन के लिए नशा बंद

नशे से मुक्ति हेतु अमेरिकन फ़ेलोशिप अल्कोहोलिक्स एनोनिमस ने "एक बार में एक दिन" की नई अवधारणा दी जो सबसे सफल साबित हुई है। कहावत है कि एक बार का शराबी हमेशा का शराबी ( once addict always addict ) इस कहावत के अनुसार जो एक बार शराबी हो जाता है तो चाहे उसने कितने भी दिन से नशा बंद कर के रखा हो उसके दुबारा नशा करने की संभावना हमेशा रहती है और उस पर फिर से नशा करने की तलवार लटकती रहती है। हम लोगों के अनुभव बताते है कि नशा बंद करने के 2 साल या 5 साल बाद भी लोग दुबारा नशा कर लेते है इसीलिये एक एडिक्ट को हमेशा यह बात याद रखनी चाहिए है कि वह भी किसी भी दिन दुबारा पी सकता है इसलिए उसे रोज सतर्क रहना चाहिए। इस सतर्कता को बनाये रखने के लिए अल्कोहोलिक्स एनोनिमस ने कहा कि "एक बार में एक दिन" इसके अनुसार हमें अपना नशा बंद करने का कार्यक्रम केवल एक दिन का बनाना है और वो दिन आज का दिन है, हमें केवल आज के दिन अपने नशे को पकड़ के रखना है क्योंकि हम आज भी पी सकते है। हम देखते है कि अधिकतर व्यक्ति कहते है कि अब मैं कभी नही नशा करूँगा तो उसको लगता है कि अब कभी नशा नहीं करना तो आज तो कर लेता हूँ क्योंकि कल से तो हमेशा के लिए बंद कर दूंगा पर कल कभी नहीं आ पाता है, क्योंकि 'कल' एक काल्पनिक दिन है जो कभी नहीं आता है हम कभी नहीं कह सकते कि आज 'कल' है इस कारण लोगों को "कल से बंद कल से बंद" कहते हुए सालों बीत जाते है पर नशा बंद नही होता। इस कार्यक्रम ने कहा कि बस एक दिन 'आज' के दिन बंद और 'आज' कभी नहीं जाता हम हमेशा 'आज' में होते है। केवल आज के दिन बंद करने की अवधारणा की मदद से विश्व में 50 लाख लोग सालों से नशे से दूर है ये लोग कभी नहीं कहते कि हम कभी नही पीयेंगे ये हमेशा कहते है कि हम बस आज नही पीएंगे।
राजीव तिवारी, एडिक्शन काउंसलर।

Friday, December 27, 2019

नशा व्यक्ति के विचार, व्यवहार और भावनाओं को विकृत कर देता है

नशा या एडिक्शन एक ऐसी बीमारी है जो इसके पीड़ित के शरीर के साथ साथ उसके विचार, व्यवहार और भावनाओं को भी विकृत कर देती है। इसके पीड़ित के विचार विकृत हो जाते है उसके विचार आत्मकेंद्रित और स्वार्थी हो जाते है जिस कारण वह सिर्फ अपने बारे में सोचता है और उसके विचार पूरी तरह से नकारात्मक हो जाते है वह हर कार्य, लोगों और परिस्थितियों में बुराई सबसे पहले ढूंढता है। व्यक्ति का व्यवहार पूरी तरह से उसके विचारों पर निर्भर होता है जिस व्यक्ति के विचार नकारात्मक हो जाते है उसका व्यवहार में भी नकारात्मकता हावी हो जाती है वह वो कार्य करने लगता है जो शायद वो खुद भी न करना चाहे, नशैलची को आप घर और बाहर लोगों से छोटी छोटी बातों पर लड़ते, बहस करते, तोड़ फोड़ करते देख सकते है इसके साथ साथ वो लोगों की बुराई करने लगता है कमियां निकलने लगता है और उसकी किसी के साथ नहीं पटती है। वह हर कार्य में नकारात्मक पक्ष पर ज्यादा जोर देने लगता है। जैसे जैसे एक व्यक्ति का नशा बढ़ता जाता है उसकी भावनाएं भी विकृत या ख़राब होती जाती है जिसके कारण वह हमेशा अकेलापन, अधूरापन और बैचेनी महसूस करता है और इसका कारण उसके अंदर नकारात्मक भावनाएं जैसे क्रोध, खुन्नस, भय, घृणा, अपराधबोध, हीनभावना और जलन इत्यादि भावनाओं का प्रबल होना होता है।
एक नशैलची को नशा बंद न कर पाने और दुबारा नशे  की और ले जाने में सबसे बड़ा हाथ उसकी नकारात्मक भावनाओं का होता है इसीलिए उसके भय, खुन्नस, अपराधबोध और हीनभावना के समाधान की भी आवश्यकता होती है जिसको काउन्सलिंग और साइकोथेरेपी के माध्यम से दूर किया जा सकता है। शुद्धि नशा मुक्ति केंद्र में मरीज के विचार और भावनाओं पर भी कार्य किया जाता है जिससे वे अच्छा महसूस करने लगते है और नशे से दूर बने रहते है।
Rajeev tiwari 9981665001
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Sunday, December 8, 2019

नशा क्या है ?

सामान्य बोल चाल की भाषा में शराब, गांजा, स्मैक, टेबलेट या अफीम आदि को नशा कहा जाता है किंतु चिकित्सकीय भाषा में ये सभी ड्रग्स है और इन सबका औषधीय उपयोग है जैसे अल्कोहोल, गांजा और अफीम का उपयोग दवा बनाने वाली कंपनियों द्वारा दवा बनाने में किया जाता है और लोगों द्वारा बहुत सी दवाएं जैसे नेटराबेट 10, विलियम 10, मार्फिन आदि का उपयोग नशे में किया जाता है। ये सब दवाएं है तो नशा क्या है ? चिकित्सा शास्त्र के अनुसार नशा अर्थात एडिक्शन ये एक बीमारी है ये जिसको हो जाती है वह किसी पदार्थ का अनियंत्रित उपयोग करने लगता है या कोई कार्य/ व्यवहार बार बार करने लगता है इसके कारण उसका जीवन अस्त व्यस्त हो जाता है। एडिक्शन को मुख्यतः दो भागों में बांटा जाता है:-
1. सब्स्टेन्स एडिक्शन या पदार्थ का नशा ;
2. बिहेवियरल एडिक्शन या व्यवहार का नशा।
पदार्थ के नशे में शराब, गांजा, चरस, अफीम या अन्य भौतिक पदार्थ का अनियंत्रित उपयोग होता है और वह शारीरिक और मानसिक रूप से पदार्थों पर निर्भर हो जाता है और जब बंद करना चाहता है तो उसे शारीरिक और मानसिक कष्ट होता है जिस कारण वो चाह कर भी इन्हें बंद नही कर पाता है। बेहविओरल या व्यवहार के नशे में जुआ, सोशल मीडिया, सेक्स, वीडियो गेम जैसे पब्जी आदि आते है इनकी मानसिक निर्भरता होती है व्यक्ति को केवल यह करने पर ही अच्छा लगता है और वो चाह कर भी इनको बंद नहीं कर पाता है चाहे इस कारण उनका कितना भी नुकसान हो रहा हो। आपने कई जुआरियों को देखा होगा अपना सब जुए में बर्बाद कर लेते है फिर भी बंद नहीं कर पाते है। आज निम्हान्स में एक सोशल मीडिया एडिक्शन वार्ड अलग से खुल गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी सोशल मीडिया के एडिक्शन को बीमारी घोषित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

Saturday, November 30, 2019

बच्चा नशा करने लगा है कैसे जाने ?

सावधान रहे,

स्कूल एवं कॉलेजों में नशे का कारोबार बढ़ने की बाते लगातार संबे आ रही है और लोग बच्चों को ड्रग्स सप्लाई करते हुए पकडे भी जा रहे है। यदि ऐसी किसी बात की थोड़ी सी भी भनक आपको लगे तो फ़ौरन पुलिस को सूचित करें। नहीं तो ये एक चैन होती है जो एक बच्चे से दो और दो से चार की संख्या में फैलती है। एक सर्वे बताता है कि भारत में नशा करने की औसत आयु 14 वर्ष रह गयी है। आज नशे के सौदागरों का आसान निशाना मासूम बच्चे है। यदि निम्न में से कोई लक्षण बच्चे में दिखे तो इसका मतलब है बच्चा कोई नशा कर रहा है -
1 उसकी आँखें लाल रहने लगी है ;
2 उसके सोने और जागने का पैटर्न बदल गया है अब वो देर से सोता और देर से जगता है या कभी भी सो जाता है ;
3 उसके परीक्षाओं में नंबर लगातार कम होते जा रहे है ;
4 वो पैसे की मांग अधिक करने लगा है ;
5 आपके घर में पैसे की छोटी छोटी चोरियां ज्यादा होने लगी है ;
6 चेहरा रुख रहने लगा है ;
7 सज सँवर कर रहने में, टीवी देखने और खेलने में रूचि कम हो गयी है ;
8 मुंह से बदबू आने लगी है जले की सी या अन्य केमिकल की ;
9 बच्चा दैनिक कार्यों जैसे नहाना या ब्रश करना में आलस करता है या इन्हें किये बगैर घर से निकल जाता है ;
10 उसके स्कूल से अनुपस्थिति की शिकायतें आने लगी है ;
11 पेंट या शर्ट की जेबों के कोनों में पत्तियों के छोटे छोटे पत्ते यदि दिखाई दे, क्योंकि आजकल छात्रों में गांजे का प्रचलन बड़ा है और जेब में रखने पर जेब में कौनों में कुछ हिस्सा रह जाता है ;
12 वह अपनी उम्र से बड़ी उम्र के लोगों के साथ रहने लगा है ;
13 वह बाथरूम में ज्यादा समय लगाने लगा है ;

यदि इसके अलावा कोई और भी संदिग्ध गतिविधियां दिखती है तो उस पर गौर किया जाना चाहिए क्योंकि स्कूल और कॉलेज में नशे करने का खतरा ज्यादा है यदि बच्चा यहाँ से सुरक्षित निकल जाता है तो उसके जीवन में नशा करने की संभावना कम हो जाती है ।  यदि किस तरह का नशा करने की बात पता चले तो फ़ौरन विशेषज्ञ से सलाह ले।
राजीव तिवारी, एडिक्शन काउंसलर, 9981665001
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नशे से मुक्ति में व्यायाम का महत्त्व

आज हम जानते है कि नशे से मुक्ति में व्यायाम कैसे सहायक होता है। शुरुआत हम इस बात से करेंगे कि नशा करने के कारण लगभग 25% नशा करने वाले लोगों में नशे के ऊपर शारीरिक और मानसिक निर्भरता आ जाती है जिस कारण यदि वे नशा बंद करते है तो उन्हें शारीरिक और मानसिक कष्ट होता है विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार यह निर्भरता एक बीमारी है जिसे एडिक्शन का नाम दिया गया है। मानसिक कष्ट से तात्पर्य नशा बंद करने पर सब बुरा लगना, जीवन नीरस लगना, अकेलापन महसूस होना, बैचेनी और चिड़चिड़ापन होना है। नशा करने का कारण यह है कि नशा करने से अच्छा महसूस होता है इस लिए इतने लोग नशा करते है और नशा करने से अच्छा महसूस होने का कारण मादक पदार्थों में ऐसे गुण होना है कि जब लोग इनका सेवन करते है तो उनके मस्तिष्क में 'डोपेमिन' नाम का हार्मोन निकलता है यह हार्मोन एक सकारात्मक प्रभाव देता है जिससे लोगों को अच्छा महसूस होता है। यह निर्भरता होने के बाद व्यक्ति जब तक नशा न कर ले उसको कुछ भी हो जाये अच्छा नही लगता है और बुरा महसूस होता है क्योंकि उसके मस्तिष्क में डोपेमिन हार्मोन बिना नशे के नहीं बन पाता है जिस कारण उसको अच्छा महसूस करने के लिए न चाह कर भी दुबारा नशा करना पड़ता है। हमने देखा होगा की एक शराबी दारू पीकर पड़ौसी की शादी में भी जम नाच देगा पर अगर उसके खुद के घर में शादी है और अगर वो दारू न पी पाये तो उसे देखकर लगेगा वो किसी गमी में आया है।
यहाँ नशा बंद करने वाले व्यक्ति को अच्छा महसूस करने के लिए व्यायाम सहायक सिद्ध होता है क्योंकि जब हम व्यायाम करते है तो हमारे मस्तिष्क में 'एंडोर्फिन' नाम का हार्मोन निकलता है जो हमें अच्छा महसूस करवाता है और उसको बुरा महसूस होना कम हो जाता है जिस कारण उसके दुबारा नशे की तरफ जाने की संभावना कम हो जाती है,इसीलिए नशा बंद करने वालों को व्यायाम अवश्य करना चाहिए।
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Thursday, November 28, 2019

नशे के सौदागरों को नशा पीड़ित का पत्र

प्रिय नशे के सौदागरों,
मुझे आज तुम्हे ये पत्र लिखते हुए तुम पर गुस्सा नही तरस ज्यादा आ रहा है क्योंकि जो काम तुम कर रहे हो उसके अंजाम की तुम्हे खबर भी नहीं है। आज जो तुम थोड़े नही बहुत सारे पैसे जल्दी से कमाने के लिए ये जो ज़हर समाज में बेच रहे हो ये केवल हमारे बच्चों को ही नहीं मारेगा इसमें तुम्हारे बच्चे भी मारे जायेंगे इसका मैं खुद गवाह हूँ। यकीन नहीं हो तो पंचशील नगर में स्मैक बेचने वाली शैली के परिवार का हाल जान लो। उसने आज से 15 साल पहले जल्दी अमीर बनने और अपने दो बच्चे जिसमे एक बेटा और एक बेटी थे को अच्छी सुविधाएँ देने के लिए स्मैक बेचना शुरू किया उसने पैसा भी कमाया पर जल्द ही उसका बेटा भी स्मैक की चपेट में आ गया और उसकी बेटी ने उसी के स्मैक के ग्राहक से शादी कर ली। आज उसका बेटा और दामाद स्मैक के ओवरडोज़ से मारे जा चुके है और उसकी बेटी और बहू दोनों विधवा हो चुकी है। ये हश्र तुम्हारे बच्चों का भी हो सकता है।
तुम्हे अंदाजा तो होगा ड्रग्स निरोधक कानून एन डी पी एस एक्ट का जिस दिन फंसोगे न तो महीनों जेल में सड़ोगे ये सही बात है कि गवाहों के बयान पलटने के कारण शायद कुछ महीने में बाहर आ जाओ पर उसके बात समाज तुम्हे किस गन्दी नजरों से देखेगा इसकी तुम्हे कल्पना भी नहीं है कोई तुम्हारे बच्चों से शादी भी नहीं करेगा।
देखना तुम्हारे बच्चे भी तुम्हे देखकर ड्रग्स बेचने के कारोबार में लग जायेंगे और ईश्वर ने चाहा तो एक दिन तुम्हारे बच्चे भी ड्रग्स के साथ पकडे जाकर तुम्हारे साथ जेल जायेंगे फिर क्या जवाब दोगे तुम उन्हें ?

अभी तो तुम्हे बेचने में मज़ा आ रहा है क्योंकि मिलीभगत से तुम लोग बेच ले रहे हो पर कभी तुमने सोचा है कि आसान तरीके से ज्यादा पैसा कमाने की तुम्हारी लालसा के कारण तुम्हारी ड्रग्स से कितने परिवार बर्बाद हो रहे है, कितने लोगों के सपने टूट रहे है जो उन्होंने अपने बच्चों के भविष्य के लिए देखे थे और खुद के लिए देखे थे, कितने बच्चे नर्क का जीवन जीने को मजबूर हो गए है, कितने लोगों के घरों के चिरागों को तुमने बुझा दिया है, ड्रग्स के नशे में लोगों से कितने अपराध हो रहे है और कितने लोग बीमारियों से ग्रसित हो गए है ? आज पैसे की चमक के कारण तुम इस बारे में नहीं सोच पा रहे हो पर देखना एक दिन तुम्हारा जमीर तुम्हे जरूर कटोचेगा कि ये मैंने क्या कर दिया, फिर उससे कैसे भागोगे उसको पैसा नही खिला पाओगे।

अभी तुम्हे फिलीपींस का हाल शायद मालूम नहीं होगा जहाँ के राष्टपति रोड्रिगो दुतेर्ते ने शासन सँभालते ही हजारों ड्रग्स बेचने वालों को ढूंढ ढूंढ कर घरों से निकल निकाल कर मार डाला था ईश्वर करे ऐसा कोई शासक भारत में भी आ जाये और तुम सभी अपने परिवार सहित मार डाले जाओ क्योंकि मैं जानता हूँ तुम लोगों के कारण लाखों लोग मर रहे है। ये मौतें नहीं तुम्हारे द्वारा की गई हत्याएं है। तुम लोगों का पूरा परिवार नशे के कारोबार में लिप्त रहता है तुम्हे तुम्हारे परिवार सहित मार दिया जाना चाहिए।
ईश्वर से प्रार्थना है कि इससे पहले कि ये सब तुम्हारे साथ हो तुम लोग सुधर जाओ और ड्रग्स बेचने के काम से तौबा कर लो।

                                            तुम्हारा शुभचिंतक
                                               राजीव तिवारी
                                   तुम्हारी बेची ड्रग्स का  शिकार।

Sunday, November 3, 2019

अच्छे पढ़े लिखे और समझदार लोग भी नशे में फंसने के बाद नहीं निकल पाते है।

हमें अपने बीच लगातार ऐसे लोग दिखते है जो लोगों को स्वास्थ्य संबंधी सलाह दे रहे होते है, पढे लिखे होते है जैसे डॉक्टर, इंजीनियर, आई ए एस, आई पी एस जो समाज में अच्छा कार्य कर रहे होते है कसरत भी लड़ते है और अपने स्वास्थ्य का ध्यान भी रखते है पर वे भी सिगरेट और गुटखा खाते हुए दिख जाते है। क्या कारण है इसका ? इसके नुकसानों को जानते हुए भी ये लोग क्यों पी रहे है ? इस बात की गहराई में जायेंगे तो जानेंगे की ये लोग भी अब इसको नही पीना और खाना चाहते है पर जिस छोटी उम्र में इन्होंने किसी दूसरे छोटे बच्चे के कहने पर जिज्ञासावश लेना शुरू किया था उस वक्त ये इसके नुकसानों के बारे में नहीं जानते थे और न ही जीवन भर पीना चाहते थे वे तो बस एक बार लेकर देखना चाहते थे। किंतु जैसा की तम्बाखू के अंदर गुण है उसको लेने के बाद मस्तिष्क में डोपेमिन नाम का हार्मोन निकलता है जो व्यक्ति को अच्छा महसूस करवाता है और फिर वो इसमें फंसता चला जाता है।
तंबाकू की शारीरिक और मानसिक निर्भरता बहुत अधिक होती है इसको लेना शुरू करने के बाद यह बहुत तेजी से व्यक्ति की निर्भरता बढ़ाता है इसकी निर्भरता कोकीन और हेरोइन की तरह ही होती है जिस कारण यदि वह बंद करना भी चाहे तो उसको शारीरिक निर्भरता के कारण शारीरिक कष्ट होता है और उसके मस्तिष्क के कारण कुछ भी अच्छा नही लगता है जिस कारण वो चाह कर भी उसको बंद नही कर पाता है।
इसको एक बार शुरू करने के बाद चिकित्सा और विशेषज्ञ की मदद के बाद भी छोड़ना मुश्किल होता है इसीलिए इस ज़हर से समाज को बचाने के लिए आवश्यक है कि हम बच्चों को इसके नुकसानों के बारे में शुरू करने से पहले जागरूक करें क्योंकि यदि उन्होंने एक बार इसे ले लिया तो फिर बंद करना असंभव जैसा है । देश् में हर साल 20 लाख लोग तम्बाखू से मर रहे है पर वे इसे बंद नही कर पाते।
धूम्रपान कैसे बंद करें जानने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें-
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सक्रिय धूम्रपान से ज्यादा असक्रिय धूम्रपान है।

यह एक आम भारतीय परिवार का प्रतिनिधित्व करता चित्र है जिसमे घर का मुखिया जो अधिकतर पुरुष होता है घर में ही सबके बीच बीड़ी या सिगरेट का सेवन कर रहा होता है उसको अंदाजा ही नही होता की वो अपने परिवार को क्या नुकसान पहुंचा रहा है। चिकित्सा शास्त्र की भाषा में धूम्रपान/स्मोकिंग दो तरह से होते है पहला सक्रीय या एक्टिव स्मोकिंग दूसरा असक्रिय या पैसिव स्मोकिंग। जब कोई व्यक्ति सिगरेट या बीड़ी पी रहा होता है उसे एक्टिव स्मोकिंग कहते है और जो धुआं वो छोड़ रहा होता है वो किसी अन्य व्यक्ति जो धूम्रपान नही कर रहा है के सांस लेने के दौरान उसके शरीर में जाता है इसे असक्रिय या पैसिव स्मोकिंग कहते है। डॉक्टर्स के अनुसार सिगरेट पीने वाले की तुलना में न पीने वाले को उसके धुंए से ज्यादा नुकसान होता है क्योंकि उसका शरीर उस धुंए का अभ्यस्त नही होता है। हमारे यहाँ 80% कैंसर का मुख्य कारण तम्बाखू होता है। इसके अतिरिक्त धूम्रपान के कारण सांस संबंधी बहुत सी बीमारियां हो जाती है जिस कारण व्यक्ति की कार्यक्षमता कम हो जाती है। सर्वे यह बताते है कि पैसिव स्मोकिंग या असक्रिय धूम्रपान करने वाले के शरीर में तम्बाखू का धुआं जाने के कारण उसको भी कैंसर और अन्य सांस संबंधी बीमारियां हो जाती है तथा उनकी भी काम करने की क्षमता कम हो जाती है। एक और सर्वे यह बताता है कि अभी तक लगभग 50 लाख लोगों की मौत पैसिव स्मोकिंग/असक्रिय धूम्रपान के कारण हो गयी है और इसका घटना स्थल अधिकांशतः उनका घर था जहाँ कोई परिजन धूम्रपान करता था जिसका धुआं उनके शरीर में जाता था या उसका कार्यस्थल था जहाँ उसका सहकर्मी धूम्रपान करता था। जिस परिवार में बच्चे बड़ों को धूम्रपान करते हुए देखता है उनके भी करने की संभावना ज्यादा होती है।
यह बंद होना चाहिए।

नशा बीमार को अपराधी बना देता है।

ये हमारे समाज में होने वाली एक आम घटना है जिसमे दोस्त, सहकर्मी या रिश्तेदार मज़ा करने के लिए या कोई ख़ुशी साथ में शराब पी रहे होते है और ज्यादा पी लेने पर उनमें आपस में ही विवाद हो जाता है जिसकी परिणीति ऐसी या इससे भी भयंकर घटना के रूप में आम होती रहती है। आये दिन हम पड़ते है शराब पीने के दौरान सेल ने जीजा की, दोस्त ने दोस्त की, भाई ने भाई की या साथ काम करने वाले की हत्या कर दी और जब इन घटनाओं की गहराई में जाये तो पता चलता है कि दोनों पक्षों में किसी तरह की कोई दुश्मनी नही थी बल्कि बहुत अच्छे संबंध थे बस ज्यादा पी लेने के बाद किसी छोटी सी बात पर विवाद हो गया और नशे नशे में घटना घट गयी। अधिकांश तो शराब के झगडे वाले लोग अपराधी प्रवत्ति के लोग भ8 नही होते है ये भी सभ्य समाज का हिस्सा होते है बस नशे में इनसे ऐसा हो गया।
एक सर्वे बताता है कि कुल अपराधों में से लगभग 40% अपराधों के पीछे शराब या ड्रग्स का हाथ होता है और ये नशे में अपराध करने वाले अधिकांशतः गैर आपराधिक प्रवत्ति के होते है। ये वो लोग होते है जिन्हें एडिक्शन नाम की बीमारी होती है जिसका मरीज अपने नशे पर नियंत्रण खो चुका होता है, उसका नशा लगातार बढ़ रहा होता है और वो शारीरिक और मानसिक रूप से उस पर निर्भर हो चुका होता है। अपनी इस बीमारी के कारण ये लोग इतनी अधिक मात्रा में नशा कर लेते है कि उसके बाद इनका अपने मस्तिष्क पर से नियंत्रण समाप्त हो जाता है।जिसको एडिक्शन की बीमारी हो जाती है वो चाह कर भी अपना नशा बंद नही कर पता है क्योंकि निर्भरता के कारण बंद करने पर उसको तकलीफ होती है।
यदि आपके नजदीक कोई ऐसा व्यक्ति है जो इतना नशा कर लेता है कि फिर अपने नियंत्रण में नही रहता है तो उसका उपचार कराएं वो बीमार है, ये उसके लिए मदद होगी अन्यथा वो भी किसी अपराध में फंस सकता है।


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Thursday, October 31, 2019

धूम्रपान से खुद के साथ दूसरों को भी नुकसान पहुंचा रहे है।

यह एक आप भारतीय परिवार का प्रतिनिधित्व करता चित्र है जिसमे घर का मुखिया जो अधिकतर पुरुष होता है घर में ही सबके बीच बीड़ी या सिगरेट का सेवन कर रहा होता है उसको अंदाजा ही नही होता की वो अपने परिवार को क्या नुकसान पहुंचा रहा है। चिकित्सा शास्त्र की भाषा में धूम्रपान/स्मोकिंग दो तरह से होते है पहला सक्रीय या एक्टिव स्मोकिंग दूसरा असक्रिय या पैसिव स्मोकिंग। जब कोई व्यक्ति सिगरेट या बीड़ी पी रहा होता है उसे एक्टिव स्मोकिंग कहते है और जो धुआं वो छोड़ रहा होता है वो किसी अन्य व्यक्ति जो धूम्रपान नही कर रहा है के सांस लेने के दौरान उसके शरीर में जाता है इसे असक्रिय या पैसिव स्मोकिंग कहते है। डॉक्टर्स के अनुसार सिगरेट पीने वाले की तुलना में न पीने वाले को उसके धुंए से ज्यादा नुकसान होता है क्योंकि उसका शरीर उस धुंए का अभ्यस्त नही होता है। हमारे यहाँ 80% कैंसर का मुख्य कारण तम्बाखू होता है। इसके अतिरिक्त धूम्रपान के कारण सांस संबंधी बहुत सी बीमारियां हो जाती है जिस कारण व्यक्ति की कार्यक्षमता कम हो जाती है। सर्वे यह बताते है कि पैसिव स्मोकिंग या असक्रिय धूम्रपान करने वाले के शरीर में तम्बाखू का धुआं जाने के कारण उसको भी कैंसर और अन्य सांस संबंधी बीमारियां हो जाती है तथा उनकी भी काम करने की क्षमता कम हो जाती है। एक और सर्वे यह बताता है कि अभी तक लगभग 50 लाख लोगों की मौत पैसिव स्मोकिंग/असक्रिय धूम्रपान के कारण हो गयी है और इसका घटना स्थल अधिकांशतः उनका घर था जहाँ कोई परिजन धूम्रपान करता था जिसका धुआं उनके शरीर में जाता था या उसका कार्यस्थल था जहाँ उसका सहकर्मी धूम्रपान करता था। जिस परिवार में बच्चे बड़ों को धूम्रपान करते हुए देखता है उनके भी करने की संभावना ज्यादा होती है।
अतः आवश्यकता है कि हम हमारे आस पास के लोगों को इस बारे में जागरूक करें और यदि स्वयं ऐसा करते है तो इसको तुरंत बंद करें ये हमारे साथ साथ हमारे करीबियों को नुकसान पहुंचा रहा है। इस नुकसान को रोकने के लिए ही कानून में सार्वजानिक रूप से पीना प्रतिबंधित है।
धूम्रपान कैसे बंद करें जानने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें-
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यह एक आप भारतीय परिवार का प्रतिनिधित्व करता चित्र है जिसमे घर का मुखिया जो अधिकतर पुरुष होता है घर में ही सबके बीच बीड़ी या सिगरेट का सेवन कर रहा होता है उसको अंदाजा ही नही होता की वो अपने परिवार को क्या नुकसान पहुंचा रहा है। चिकित्सा शास्त्र की भाषा में धूम्रपान/स्मोकिंग दो तरह से होते है पहला सक्रीय या एक्टिव स्मोकिंग दूसरा असक्रिय या पैसिव स्मोकिंग। जब कोई व्यक्ति सिगरेट या बीड़ी पी रहा होता है उसे एक्टिव स्मोकिंग कहते है और जो धुआं वो छोड़ रहा होता है वो किसी अन्य व्यक्ति जो धूम्रपान नही कर रहा है के सांस लेने के दौरान उसके शरीर में जाता है इसे असक्रिय या पैसिव स्मोकिंग कहते है। डॉक्टर्स के अनुसार सिगरेट पीने वाले की तुलना में न पीने वाले को उसके धुंए से ज्यादा नुकसान होता है क्योंकि उसका शरीर उस धुंए का अभ्यस्त नही होता है। हमारे यहाँ 80% कैंसर का मुख्य कारण तम्बाखू होता है। इसके अतिरिक्त धूम्रपान के कारण सांस संबंधी बहुत सी बीमारियां हो जाती है जिस कारण व्यक्ति की कार्यक्षमता कम हो जाती है। सर्वे यह बताते है कि पैसिव स्मोकिंग या असक्रिय धूम्रपान करने वाले के शरीर में तम्बाखू का धुआं जाने के कारण उसको भी कैंसर और अन्य सांस संबंधी बीमारियां हो जाती है तथा उनकी भी काम करने की क्षमता कम हो जाती है। एक और सर्वे यह बताता है कि अभी तक लगभग 50 लाख लोगों की मौत पैसिव स्मोकिंग/असक्रिय धूम्रपान के कारण हो गयी है और इसका घटना स्थल अधिकांशतः उनका घर था जहाँ कोई परिजन धूम्रपान करता था जिसका धुआं उनके शरीर में जाता था या उसका कार्यस्थल था जहाँ उसका सहकर्मी धूम्रपान करता था। जिस परिवार में बच्चे बड़ों को धूम्रपान करते हुए देखता है उनके भी करने की संभावना ज्यादा होती है। अतः आवश्यकता है कि हम हमारे आस पास के लोगों को इस बारे में जागरूक करें और यदि स्वयं ऐसा करते है तो इसको तुरंत बंद करें ये हमारे साथ साथ हमारे करीबियों को नुकसान पहुंचा रहा है। इस नुकसान को रोकने के लिए ही कानून में सार्वजानिक रूप से पीना प्रतिबंधित है। धूम्रपान कैसे बंद करें जानने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें- https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=2349183701806696&id=1027277323997347

Wednesday, October 16, 2019

स्मैक पीने वाले तेज़ी से HIV पॉजिटिव हो रहे है।

पिछले कुछ सालों में स्मैक या ब्राउन शुगर मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, गुजरात और उत्तर प्रदेश में छोटे छोटे कस्बों में भी पैर पसार चुका है इसके एक डोज़ को टिकट कहा जाता है स्वर्ग का टिकट क्योंकि यह व्यक्ति को उड़ा देता है या कहें कि वो इसको पीकर खुद को उडाता हुआ भी महसूस कर सकता है। स्मैक जब बच्चे और युवा पीना शुरू करते है तो पहले वो उसे सिल्वर फॉयल जो की खाना पैक करने वाली पन्नी होती है उस पर जला कर उसका धुआं पीते है और धीरे धीरे उसका डोज़ बढ़ता चला जाता है जो नशा पहले  जब एक टिकट में होता था वही नशा धीरे धीरे दो फिर तीन टिकट में होने लगता है और लगातार बढ़ता चला जाता है। जब व्यक्ति धीरे धीरे इसका एडिक्ट हो जाता है तो इसकी उच्च शारीरिक और मानसिक निर्भरता होती है। इसका एडिक्ट होने के बाद व्यक्ति यदि नशा न करे तो उसको बहुत तकलीफ होती है जिस कारण उसको किसी भी हालात में ये करना होता है। ज्यादा नशा करने के कारण स्मेकिये या पाउडरिये का काम धंधा सब बंद हो जाता है और वो लोगों से उधार लेना शुरू कर देते है और जब यह रास्ता भी बंद लोग भी अच्छे से जान जाते है कि यह उधार  पैसे का इंतेज़ाम करने में भी दिक्कत होने लगती है तो चोरी छिना झपटी का भी दौर आ जाता है। यहाँ ये बात खास जानने योग्य है कि जब उनके पास पैसों की बहुत कमी हो जाती है तो वे पन्नी पर जलाकर पीने की जगह स्मैक को एविल के इंजेक्शन को गर्म करके उसमें मिलकर हाथों में इंजेक्शन द्वारा लेने लगते है। इस तरीके से लेने पर पन्नी से पीने पर जो नशा 4 टिकट में होता उससे ज्यादा नशा एक टिकट में हो जाता है। यहाँ पैसे तो बचने लगते है चार की जगह एक में ही काम हो जाता है किंतु जब ये समूह में नशा कर रहे होते है तो बहुत बार ये अनजाने में या जानबूझकर एक ही सिरिंज से इंजेक्ट कर लेते है और एक दूसरे को अपनी बीमारियां हस्तांतरित कर देते है। नशा मुक्ति केंद्रों में भर्ती होने वाले इन मरीजों में देखा गया है कि इंजेक्ट करने वाले हर दस में से दो मरीज एच आई वी पॉजिटिव (HIV Positive) निकल रहे है और इनको पता चल चुका है कि इनको HIV हो गया है तो इनके मन में अब कोई आशा भी नही रह गयी है और ये डूब कर नशा कर रहे है और इस रोग को तेजी से फैला रहे है। इनको चिन्हित कर के यदि अलग नहीं किया गया, जो पी रहे है उनका उपचार द्वारा रोका नही गया और स्मैक की उपलब्धता पर लगाम नही लगी तो जो हालात पंजाब में बन रहे है वही यहाँ भी होंगे।
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Monday, October 14, 2019

खुद पिता अपने बच्चों को तम्बाखू के जाल में फंसा रहे है।

आम तौर पर पान की दुकानों पर हमें ऐसे लोग दिख जायेंगे जो अपने लिए सिगेरट, बीड़ी या गुटखा लेने आते है तो अपने साथ छोटे बच्चों को भी ले आते है, ये लोग जानते नहीं है कि इसका उस बाल मन पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। कहीं न कहीं ये बच्चा भविष्य का तम्बाखू उपयोगकर्ता बनने के लिए तैयार हो रहा है। दूसरे बच्चों की तुलना में उन बच्चे के तम्बाखू उपयोग करने की संभावना ज्यादा हो जाती है जिनके माता पिता तम्बाखू का उपयोग उनके सामने करते है, उनको बचपन से अपने साथ पान की दुकानों में ले जाते है और बहुत बार उनको अकेले लेने भी भेजते है।
सभी गुटखे के पाउच बहुत आकर्षक रंग के होते है जो की बच्चों को आकर्षित करते है और उनके अवचेतन मन में उसके उपयोग की उत्सुकता पैदा करते है। जब पिता द्वारा ही उनको अपने साथ ले जाया जाता है तो उस दुकान पर जाना उसके लिए सामान्य सी बात हो जाती है अन्य बच्चों की तरह उसके अंदर हिचक नहीं होती है। जैसे ही उसकी पहुँच पैसो तक होती है उसका मन अपनी तम्बाखू लेकर देखने की इच्छा पूरी करने का होने लगता है और मौका मिलते ही वह खरीद लाता है और चूंकि बचपन से ही अपने पिता को उपयोग करते देख रहा होता है इस कारण उसको कैसे उपयोग करना है यह बखूबी उसको आता है।
हम जानते है कि कोई भी व्यक्ति जो खुद तम्बाखू के जाल में फंस गया है उनको लेना उसकी मजबूरी बन चुकी है वो कभी भी नहीं चाहेगा कि उसका बच्चा इसमें फंस जाये क्योंकि अब उसको खुद को नुकसान होने शुरू हो चुके होते है पर वो अनजाने ही अपने बच्चे को इसमें फंसाने की पृष्ठभूमि तैयार कर देता है।
हमारे देश में हर साल 20 लाख लोग तम्बाखू से मर रहे है तम्बाखू का सेवन करोड़ों लोगों को बीमार किये हुए है और उनकी कार्यक्षमता कम करता जा रहा है जो इसमें फंस गए है उनका निकल पाना बहुत मुश्किल है पर यदि हमें आने वाली पीढ़ी को इसके प्रकोप से बचाना है तो हमें अपने बच्चों को इसके नुकसानों के प्रति जागरूक करना होगा और यदि हम खुद इसमें फंसे हुए है तो विशेषज्ञ के माध्यम से इसमें से निकलने की कोशिश करें और अपने बच्चों के सामने उपयोग से बचे और न उनको पान गुटखा की दुकान में ले जाये और न उनको अपने लिए लेने भेजें। यदि आपका कोई परिचित भी अपने बच्चे को लेकर तम्बाखू की दुकान पर जाता है या उससे मंगवाता है तो उसे समझाएं।
राजीव तिवारी, एडिक्शन काउंसलर, शुद्धि नशा मुक्ति केंद्र, भोपाल, 9981665001
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सिगरेट एवं गुटखा से मुक्ति
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Sunday, September 29, 2019

नशैलची से कर के शादी मिलेगी केवल बर्बादी।

हम अपने आस पास देखते है कि ऐसे लोगों की भी शादी हो जाती है जो कि कुछ काम नही करते है और सबेरे से शाम नशे में चूर रहते है। ऐसे व्यक्ति की शादी उसके माँ बाप द्वारा इस आशा में की जाती है कि वो शादी के बाद नशा करना छोड़ देगा। पर चूँकि अपने नशे पर नियंत्रण न होना एक बीमारी है जो शादी करने से ठीक नही होती है इस कारण नशा पीड़ित का नशा शादी करने से भी बंद नही होता है बल्कि वह व्यक्ति शादी के बाद अचानक बड़ी हुई जिम्मेदारियों से घबराकर और उनसे भागने के लिए ज्यादा नशा करने लगता है। जिस बच्ची की शादी किसी नशा पीड़ित से हो जाती है उसकी जिंदगी में जैसे प्रलय ही आ जाती है नशा पीड़ित जो की अधिक मात्रा में नशा करने के बाद पागल जैसा हो जाता है तरह तरह से प्रताड़ित करता है वो गालियां भी बकता है, मारता भी है और शक भी करता है। नशे के कारण वह कहीं भी ठीक से काम नही करता जिससे उसकी नौकरियां भी जाती रहती हो जाती है और व्यापार भी ठप्प हो जाता है इस कारण उसके घर में लगातार आर्थिक परेशानियां बनी रहती है। नशैलची नशे में अपने आस पास के लोगों से गलत व्यवहार करता है जिससे उसका और उसके परिवार का सामाजिक बहिष्कार रहता है। एक नशैलची की पत्नी का जीवन बुरी तरह से प्रभावित रहता है वो हमेशा डर के साये में जीती है पता नही कितनी पी कर आएगा, नशे में आकर पता नही क्या करेगा, घर कैसे चलेगा, इसको कुछ हो गया तो क्या होगा आदि। इन कारणों से वह भी मानसिक बीमारियों का शिकार हो जाती है। इन सब अपमान, प्रताड़ना, निराशा, अकेलेपन, मानसिक रोगों और भय के कारण बहुत से नशैलचियों की पत्नियां आत्महत्या कर लेती है । अगर आप अपनी बेटी को इन सब दुखों और परेशानियों, मानसिक बीमारियों और आत्महत्या से बचाना चाहते है तो विवाह से पूर्व लड़के के बारे में अच्छे से पता करें।
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Wednesday, September 18, 2019

शराबी की शादी करने से उसकी शराब छूट जाती है ?

भारत में आज भी शराबी की शराब छुड़ाने के लिए सबसे पहले लट्ठ, पूजा-पाठ, बाबा-भभूत, जंतर मंतर, ताबीज-गंड़ा, महामृत्युंजय जाप, काल सर्पयोग पूजा आदि की सहायता ली जाती है पर जब यह सब उपाय असफल हो जाते है तब सभी बड़े बूढ़े शराब छुड़ाने का रामबाण बताते है वो यह है कि शादी करा दो जिम्मेदारी आएगी तो सब छोड़ देगा।जिन शराबियों की शराब छुड़ाने के लिए उनकी शादी की जाती है उसके परिणामस्वरूप अधिकतर उनकी शराब छूटने की जगह उल्टा बढ़ जाती है क्योंकि जब उसकी शादी की जाती है उस समय वो अपनी जिम्मेदारी उठाने में भी सक्षम नही होता है और ऐसे समय में उसको एक परिवार को चलने की जिम्मेदारी दे दी जाती है तो वह उसको संभाल नही पाता है और स्वयं उस जिम्मेदारी से भागने के लिए और ज्यादा शराब पीने लगता है अभी तक किये गए अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि शादी करने से नशा बंद नही होता बल्कि और बढ़ जाता है और शादी के बाद उसकी पत्नी भी शराब पीड़ित हो जाती है। शराबी के जीवन में आने वाले तूफानों से सबसे ज्यादा प्रभावित उसकी पत्नी ही होती है। जहाँ शराबी पी पी कर पागल हो रहा था उसकी पत्नी उसकी छुड़ाने की नाकाम कोशिश करते हुए पागल होती जाती है। अगर हम शराबीपन की समस्या के दूसरे पहलुओं पर विचार करें तो विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 1964 में इसको बीमारी घोषित कर दिया था उसके अनुसार कुछ लोग होते है जिनका उनकी शराब पर से नियंत्रण समाप्त हो जाता है, उनकी शराब निरंतर बढ़ती जाती है तथा वे चाह कर भी उसको बंद नहीं कर पाते है। अब बताइये जब शराबीपन एक बीमारी है और शराब पीने वाला व्यक्ति एक बुरा नहीं बल्कि एक बीमार व्यक्ति है तो ऊपर लिखे उपायों से कोई बीमारी कैसे ठीक की जा सकती है। निश्चित ही जिनको  शराबीपन की समस्या होती है उनको उपचार से ठीक किया जा सकता है। इसके लिए मनोचिकित्सक, मनोविज्ञानी, परामर्शदाता और चिकित्सकों की आवश्यकता होती है। यह एक शारीरिक और मानसिक बीमारी है इसमें शरीर के साथ विचारों पर भी काम करना होता है और इसमें कितना समय लगेगा यह इस बात पर निर्भर करेगा की कितने समय से पी रहा है और क्या मात्रा लेने लगा है।
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Tuesday, September 17, 2019

तंबाकू से समाज को मुक्त करने की दिशा में अनूठी पहल।

चंबल संभाग की कमिश्नर श्रीमती रेणु तिवारी जी की अनूठी पहल जो प्रदर्शित करती है कि आज तंबाकू से समाज के बचाव के लिए बुद्धिजीवी वर्ग भी आगे आ रहा है। भारत में प्रत्येक वर्ष लगभग 12 लाख लोग तंबाकू के सेवन के कारण होने वाली बीमारियों से मर रहे है और करोड़ों लोगों ह्रदय, साँस और कैंसर जैसी बीमारियों से जूझ रहे है इसके कारण देश की कार्यक्षमता कम हो रही है फिर भी निरंतर इसका उपभोग बढ़ता जा रहा है। जिन घरों में खुलेआम धूम्रपान किया जाता है उन घरों के वे सदस्य जो कि प्रत्यक्ष रूप से धूम्रपान नहीं कर रहे है वे भी अप्रत्यक्ष रूप से धूम्रपान करने के कारण बीमारियों का शिकार हो रहे है। तंबाकू के कारण देश का युवा हांफ रहा है वो बिना कुछ करे ही थक गया है। तंबाकू मानवता के लिए एक अभिशाप है आज भारत में 45% पुरुष और लगभग 9% महिलाएं इसके कातिल पंजों में फंस गये है और चाह कर भी जी हां छह कर भी इससे नहीं छूट पा रहे है। इससे मुक्त होने के लिए पूरे समाज को एक होकर इसके खिलाफ एक सम्मिलित आंदोलन चलाना होगा अन्यथा यह इसी तरह तेजी से फैलता रहेगा। मेरी शुभकामना है कि तंबाकू के नशे से मुक्ति का यह प्रयास पूरे चंबल संभाग के ग्वालियर, भिंड, मुरैना, दतिया और श्योपुर में सार्थक परिणाम देगा।

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सिगरेट एवं गुटखा से मुक्ति

Sunday, September 15, 2019

जब एक व्यक्ति पहले बार कोई नशा करता है तब निश्चित ही उसे अच्छा महसूस होता है इसी कारण वह दुबारा करता है यह अच्छा लगना उसे एक तरह की शक्ति प्रदान करता है जैसे शराब पीकर वह व्यक्ति भी नाचने लगता है जो शादियों में हमेशा से एक कोने में खड़ा रहता था और शराब पीकर काम बोलने वाला संकोची व्यक्ति भी अपनी बात निःसंकोच करने लगता है। इसी तरह गांजा भी एकाग्रता बढा देता है आजकल छात्रों के बीच रात भर पड़ने के लिए गांजा बहुत लोकप्रिय हो रहा है।
बहुत से खेलों में हम खिलाडियों के डोप टेस्ट में पकडे जाने की घटनाएं सुनते है जिसमे उनके ड्रग्स लेने की बात सामने आती है जो की उनके द्वारा अपना स्टेमिना बढ़ाने के लिए ली जातीं है।
इन बातों को देखकर हम कह सकते है की मादक पदार्थ में गन होता है कि वे कहीं न कहीं शक्ति प्रदान करते है पर दिक्कत इनके एक और गुण से है वो यह है कि ये एडिक्टिव होती है जिस कारण शरीर और मस्तिष्क इनके ऊपर निर्भर होता चला जाता है और जब तक इनके न ले लो शारीर सामान्य रूप से कार्य नहीं कर पाता है। हम देखते है न की जो सिगरेट व्यक्ति को एकाग्रता और ज्यादा देर तक कार्य करने की शक्ति देता है एक दिन ये आता है कि जब तक यह नहीं मिल जाये वह मल त्याग भी नही कर पता है उसको इस अति साधारण प्राकृतिक कार्य के लिए भी सिगेरट की जरूरत पड़ती है। इनकी मात्रा लगातार बढ़ती जाती है। जो व्यक्ति इन पर निर्भर हो जाता है वो जब तक यह न मिल जाएं तब तक सामान्य ही नहीं हो पाता है जैसे जैसे निर्भरता बढ़ती है नशा न मिलने पर व्यक्ति का पूरा शरीर कांपने लगता है और एक स्थिति में तो नशा न मिलने पर मृत्यु भी हो सकती है। यह समस्या उपचार से दूर हो जाती है। नशा मुक्ति केंद्र मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश और दिल्ली।

कुछ ड्रग्स ऐसी होती है जिनको लेने से गलत करने से रोकने वाला भय या संकोच चला जाता है जिसका परिणाम वीभत्स अपराध होते है।

नीचे संलग्न समाचार पत्र में ग्वालियर में एक वृद्धा के पांव के कड़े उतरने के लिए उसकी हत्या कर उसके पांव काटकर कड़े निकलने का समाचार प्रकाशित हुआ है । कोई व्यक्ति 30 हजार की चांदी के लिए ऐसी नृशंसता कैसे कर सकता है ? इस समाचार पत्र में स्मैक पीने वाले नशेड़ियों पर संदेह किया गया है। आइये हम जानते है की इसका कारण क्या है ?  कुछ ड्रग्स जैसे स्मैक या हेरोइन की एक खासियत यह होती है कि जो इनका नशा करना शुरू करता है तो इसकी शारीरिक और मानसिक निर्भरता धीरे धीरे अत्यधिक हो जाती है इसके बाद यदि यह नही मिले तो व्यक्ति को बहुत कष्ट होता है वो इसके बिना नही रह पाता है। दुसरीं खासियत यह है कि इसको लेने वाले का भावनात्मक संतुलन ख़राब हो जाता है जिस कारण यह लेने के बाद उसकी हिचक चली जाती है जिसका कारण यह होता है कि दिमाग में एक भाग होता है amygdala जो की गलत काम करने से पहले डर की भावना लाता है और डर की भावना आने पर व्यक्ति रूक जाता है पर ये ड्रग्स लेने के बाद उसकी डर की भावना आनी बंद हो जाती है जिससे वह कैसे भी नृशंस कार्य को अंजाम दे देता है और नशे का प्रभाव समाप्त होने के बाद वह स्वयं अपराधबोध से भर जाता है। इस प्रकरण में भी ये सीधे सीधे नशा करने वालों द्वारा करना ही प्रतीत होता है। ये वो बीमार लोग है जो एडिक्शन नाम की बीमारी का शिकार हो गए है और यह सब कार्य उनका नशा उनसे करवा रहा है यदि इनका उपचार करवाया जाता तो इस अपराध से बचा जा सकता था। आजकल ग्वालियर संभाग में ग्वालियर, मुरैना, भिंड ,दतिया, श्योपुर और झाँसी में लोग स्मैक के नशे की गिरफ्त में आ गए है जिनको शीघ्र उपचार की आवश्यकता है जिससे इस तरह के अपराधों से बचा जा सकता है । 

Friday, September 13, 2019

नशा करने से शक्ति मिलती है ?

जब एक व्यक्ति पहले बार कोई नशा करता है तब निश्चित ही उसे अच्छा महसूस होता है इसी कारण वह दुबारा करता है यह अच्छा लगना उसे एक तरह की शक्ति प्रदान करता है जैसे शराब पीकर वह व्यक्ति भी नाचने लगता है जो शादियों में हमेशा से एक कोने में खड़ा रहता था और शराब पीकर काम बोलने वाला संकोची व्यक्ति भी अपनी बात निःसंकोच करने लगता है। इसी तरह गांजा भी एकाग्रता बढा देता है आजकल छात्रों के बीच रात भर पड़ने के लिए गांजा बहुत लोकप्रिय हो रहा है।
बहुत से खेलों में हम खिलाडियों के डोप टेस्ट में पकडे जाने की घटनाएं सुनते है जिसमे उनके ड्रग्स लेने की बात सामने आती है जो की उनके द्वारा अपना स्टेमिना बढ़ाने के लिए ली जातीं है।
इन बातों को देखकर हम कह सकते है की मादक पदार्थ में गन होता है कि वे कहीं न कहीं शक्ति प्रदान करते है पर दिक्कत इनके एक और गुण से है वो यह है कि ये एडिक्टिव होती है जिस कारण शरीर और मस्तिष्क इनके ऊपर निर्भर होता चला जाता है और जब तक इनके न ले लो शारीर सामान्य रूप से कार्य नहीं कर पाता है। हम देखते है न की जो सिगरेट व्यक्ति को एकाग्रता और ज्यादा देर तक कार्य करने की शक्ति देता है एक दिन ये आता है कि जब तक यह नहीं मिल जाये वह मल त्याग भी नही कर पता है उसको इस अति साधारण प्राकृतिक कार्य के लिए भी सिगेरट की जरूरत पड़ती है। इनकी मात्रा लगातार बढ़ती जाती है। जो व्यक्ति इन पर निर्भर हो जाता है वो जब तक यह न मिल जाएं तब तक सामान्य ही नहीं हो पाता है जैसे जैसे निर्भरता बढ़ती है नशा न मिलने पर व्यक्ति का पूरा शरीर कांपने लगता है और एक स्थिति में तो नशा न मिलने पर मृत्यु भी हो सकती है। यह समस्या उपचार से दूर हो जाती है। नशा मुक्ति केंद्र मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश और दिल्ली।

Tuesday, September 10, 2019

किन लोगों को नशे की समस्या होने की संभावना ज्यादा होती है।

वे लोग जो अब अपने नशे को नियंत्रित नही कर पा रहे है और उनका नशा लगातार बढ़ता जा रहा है और वे चाह कर भी उसे बंद नही कर पा रहे है इसका अर्थ यह है कि अब वे एडिक्शन नामक बीमारी से पीड़ित हो गए है और अब उनको उपचार के माध्यम से ही ठीक किया जा सकता है। विभिन्न रिसर्च बताती है कि निम्न प्रकृति के व्यक्तियों में एडिक्शन से पीड़ित होने या एडिक्ट/नशैलची होने की संभावना ज्यादा होती है -
1. जिन बच्चों के माता या पिता, नाना-नानी या दादा-दादी में से कोई नशैलची होता है ;
2. वे बच्चे जो अकेले रहना ज्यादा पसंद करते है और जिनमे दोस्त बनाने की योग्यता काम होती है और यदि दोस्त बन भी लेते है तो उसको बनाये नही रख पाते है ;
3. वे बच्चे जो अपनी भावनाओं को व्यक्त नही कर पाते है जैसे गुस्सा आने पर उसको न निकलना और उसको दबा के रखे रहना जिनको हम घुन्ना कहते है या उन्हें कोई चिंता है तो उसको दूसरों के साथ शेयर न करना और अकेले ही उसके लिए परेशान होना ;
4. ऐसे बच्चे जिनके घरों में माता और पिता के सम्बन्ध ख़राब होते है और उनमें बच्चों के सामने ही विवाद होता रहता है ;
5. जो बच्चे बहुत छोटी उम्र में मादक पदार्थ लेने लगते है उनमें एडिक्ट होने की ज्यादा सम्भावना होती है क्योंकि उनके दिमाग का वह हिस्सा जो निर्णय लेता है, जजमेंट करता है और स्व नियंत्रण करता है अभी विकसित हो रहा होता है न की विकसित हो चुका रहता है फिर भी बड़ी उम्र में भी एडिक्शन में फंसने की संभावना रहती है ;
6. ऐसे छोटी उम्र के बच्चे जो नशा करने वाले बच्चों के साथ रहते है ;
7. वे बच्चे जिनकी प्रवत्ति खतरनाक काम करने की होती है ;
8. ऐसे बच्चे जिनका बचपन में किसी तरह का शारीरिक शोषण हुआ हो।
नशा मुक्ति केंद्र भोपाल, बिलासपुर, रायपुर, ग्वालियर, जयपुर, लखनऊ, जबलपुर, वड़ोदरा, सागर, होशंगाबाद, सोनभद्र, ललितपुर, टीकमगढ़, इंदौर, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़

Thursday, September 5, 2019

शराबी या एडिक्ट का परिवार भी मानसिक और शारीरिक रूप से बीमार हो जाता है।

एडिक्शन को एक फॅमिली डिसीज़ कहा जाता है र्थात यदि किसी घर में कोई एडिक्ट हो तो वह जो नशा कर रहा होता है वह तो बीमार होता ही है ( विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार किसी मादक पदार्थ पर शारीरिक और मानसिक रूप से निर्भर हो जाना बीमारी है ) उसके साथ रहने वाला उसका परिवार भी धीरे धीरे मानसिक और शारीरिक रूप से बीमार होता जाता है। इसको हम ऐसे समझेंगे जब कोई व्यक्ति एडिक्शन की बीमारी से ग्रसित हो जाता है तो उसका नशा बढ़ता जाता है और उसके द्वारा घर और बाहर बहुत से काण्ड होते रहते है जैसे घर के बाहर लोगों से और और घर में परिजनों से मार-पीट, वाहन दुर्घटना, पुलिस केस, घर में तोड़ फोड़, नौकरी से निकाल दिया जाना, व्यवसाय में नुकसान, घर का सामान बेच देना, कोई ऐसा काम  जिससे घर की आर्थिक स्थिति खराब कर हो जाये आदि और बहुत से उससे होते रहते है इस सब का प्रभाव परिजनों के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा होता है।एडिक्ट के घर वाले हमेशा भय में रहने लगते है उनको यही लगता रहता है कि शराबी घर से निकला है तो पता नहीं बाहर क्या करेगा किसी से लड़ न ले कोई उसको मार न दे या वो किसी को न मर दे एक्सीडेंट न हो जाये या जब लौटेगा तो पता नही क्या तोड़ फोड़ या मार पीट करेगा। इसके अलावा आस पास के लोग हमेशा उनके शराबी का मजाक उड़ाते है जिससे वे समाज से कटते जाते है और लोगों का सामना करने से कतराते है, उनमें हीन भावना आ जाती है और डिप्रेशन का शिकार भी हो जाते है। इस भय, चिंता, हीन भावना और सामाजिक रूप से अलग थलग पड़ने के कारण वे शारीरिक रूप से भी बीमार रहने लगते है उनमें बी पी और ह्रदय रोगों की समस्याएं बढ जाती है। एडिक्ट के उपचार के साथ परिजनों को भी काउन्सलिंग और मानसिक उपचार की आवश्यकता होता है।
नशा मुक्ति केंद्र भोपाल, विदिशा, रायसेन, सीहोर, गुना, अशोकनगर, सागर, होशंगाबाद, हरदा, कटनी, दमोह, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, धार, सूरत, वड़ोदरा, बारां, कोटा, सोनभद्र, सिंगरौली, प्रतापगढ़, नरसिंहगढ़, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, राजस्थान।

बस एक दिन के लिए नशा बंद

नशे से मुक्ति हेतु अमेरिकन फ़ेलोशिप अल्कोहोलिक्स एनोनिमस ने "एक बार में एक दिन" की नई अवधारणा दी जो सबसे सफल साबित हुई है। कहावत ह...