Sunday, September 15, 2019

कुछ ड्रग्स ऐसी होती है जिनको लेने से गलत करने से रोकने वाला भय या संकोच चला जाता है जिसका परिणाम वीभत्स अपराध होते है।

नीचे संलग्न समाचार पत्र में ग्वालियर में एक वृद्धा के पांव के कड़े उतरने के लिए उसकी हत्या कर उसके पांव काटकर कड़े निकलने का समाचार प्रकाशित हुआ है । कोई व्यक्ति 30 हजार की चांदी के लिए ऐसी नृशंसता कैसे कर सकता है ? इस समाचार पत्र में स्मैक पीने वाले नशेड़ियों पर संदेह किया गया है। आइये हम जानते है की इसका कारण क्या है ?  कुछ ड्रग्स जैसे स्मैक या हेरोइन की एक खासियत यह होती है कि जो इनका नशा करना शुरू करता है तो इसकी शारीरिक और मानसिक निर्भरता धीरे धीरे अत्यधिक हो जाती है इसके बाद यदि यह नही मिले तो व्यक्ति को बहुत कष्ट होता है वो इसके बिना नही रह पाता है। दुसरीं खासियत यह है कि इसको लेने वाले का भावनात्मक संतुलन ख़राब हो जाता है जिस कारण यह लेने के बाद उसकी हिचक चली जाती है जिसका कारण यह होता है कि दिमाग में एक भाग होता है amygdala जो की गलत काम करने से पहले डर की भावना लाता है और डर की भावना आने पर व्यक्ति रूक जाता है पर ये ड्रग्स लेने के बाद उसकी डर की भावना आनी बंद हो जाती है जिससे वह कैसे भी नृशंस कार्य को अंजाम दे देता है और नशे का प्रभाव समाप्त होने के बाद वह स्वयं अपराधबोध से भर जाता है। इस प्रकरण में भी ये सीधे सीधे नशा करने वालों द्वारा करना ही प्रतीत होता है। ये वो बीमार लोग है जो एडिक्शन नाम की बीमारी का शिकार हो गए है और यह सब कार्य उनका नशा उनसे करवा रहा है यदि इनका उपचार करवाया जाता तो इस अपराध से बचा जा सकता था। आजकल ग्वालियर संभाग में ग्वालियर, मुरैना, भिंड ,दतिया, श्योपुर और झाँसी में लोग स्मैक के नशे की गिरफ्त में आ गए है जिनको शीघ्र उपचार की आवश्यकता है जिससे इस तरह के अपराधों से बचा जा सकता है । 

Friday, September 13, 2019

नशा करने से शक्ति मिलती है ?

जब एक व्यक्ति पहले बार कोई नशा करता है तब निश्चित ही उसे अच्छा महसूस होता है इसी कारण वह दुबारा करता है यह अच्छा लगना उसे एक तरह की शक्ति प्रदान करता है जैसे शराब पीकर वह व्यक्ति भी नाचने लगता है जो शादियों में हमेशा से एक कोने में खड़ा रहता था और शराब पीकर काम बोलने वाला संकोची व्यक्ति भी अपनी बात निःसंकोच करने लगता है। इसी तरह गांजा भी एकाग्रता बढा देता है आजकल छात्रों के बीच रात भर पड़ने के लिए गांजा बहुत लोकप्रिय हो रहा है।
बहुत से खेलों में हम खिलाडियों के डोप टेस्ट में पकडे जाने की घटनाएं सुनते है जिसमे उनके ड्रग्स लेने की बात सामने आती है जो की उनके द्वारा अपना स्टेमिना बढ़ाने के लिए ली जातीं है।
इन बातों को देखकर हम कह सकते है की मादक पदार्थ में गन होता है कि वे कहीं न कहीं शक्ति प्रदान करते है पर दिक्कत इनके एक और गुण से है वो यह है कि ये एडिक्टिव होती है जिस कारण शरीर और मस्तिष्क इनके ऊपर निर्भर होता चला जाता है और जब तक इनके न ले लो शारीर सामान्य रूप से कार्य नहीं कर पाता है। हम देखते है न की जो सिगरेट व्यक्ति को एकाग्रता और ज्यादा देर तक कार्य करने की शक्ति देता है एक दिन ये आता है कि जब तक यह नहीं मिल जाये वह मल त्याग भी नही कर पता है उसको इस अति साधारण प्राकृतिक कार्य के लिए भी सिगेरट की जरूरत पड़ती है। इनकी मात्रा लगातार बढ़ती जाती है। जो व्यक्ति इन पर निर्भर हो जाता है वो जब तक यह न मिल जाएं तब तक सामान्य ही नहीं हो पाता है जैसे जैसे निर्भरता बढ़ती है नशा न मिलने पर व्यक्ति का पूरा शरीर कांपने लगता है और एक स्थिति में तो नशा न मिलने पर मृत्यु भी हो सकती है। यह समस्या उपचार से दूर हो जाती है। नशा मुक्ति केंद्र मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश और दिल्ली।

Tuesday, September 10, 2019

किन लोगों को नशे की समस्या होने की संभावना ज्यादा होती है।

वे लोग जो अब अपने नशे को नियंत्रित नही कर पा रहे है और उनका नशा लगातार बढ़ता जा रहा है और वे चाह कर भी उसे बंद नही कर पा रहे है इसका अर्थ यह है कि अब वे एडिक्शन नामक बीमारी से पीड़ित हो गए है और अब उनको उपचार के माध्यम से ही ठीक किया जा सकता है। विभिन्न रिसर्च बताती है कि निम्न प्रकृति के व्यक्तियों में एडिक्शन से पीड़ित होने या एडिक्ट/नशैलची होने की संभावना ज्यादा होती है -
1. जिन बच्चों के माता या पिता, नाना-नानी या दादा-दादी में से कोई नशैलची होता है ;
2. वे बच्चे जो अकेले रहना ज्यादा पसंद करते है और जिनमे दोस्त बनाने की योग्यता काम होती है और यदि दोस्त बन भी लेते है तो उसको बनाये नही रख पाते है ;
3. वे बच्चे जो अपनी भावनाओं को व्यक्त नही कर पाते है जैसे गुस्सा आने पर उसको न निकलना और उसको दबा के रखे रहना जिनको हम घुन्ना कहते है या उन्हें कोई चिंता है तो उसको दूसरों के साथ शेयर न करना और अकेले ही उसके लिए परेशान होना ;
4. ऐसे बच्चे जिनके घरों में माता और पिता के सम्बन्ध ख़राब होते है और उनमें बच्चों के सामने ही विवाद होता रहता है ;
5. जो बच्चे बहुत छोटी उम्र में मादक पदार्थ लेने लगते है उनमें एडिक्ट होने की ज्यादा सम्भावना होती है क्योंकि उनके दिमाग का वह हिस्सा जो निर्णय लेता है, जजमेंट करता है और स्व नियंत्रण करता है अभी विकसित हो रहा होता है न की विकसित हो चुका रहता है फिर भी बड़ी उम्र में भी एडिक्शन में फंसने की संभावना रहती है ;
6. ऐसे छोटी उम्र के बच्चे जो नशा करने वाले बच्चों के साथ रहते है ;
7. वे बच्चे जिनकी प्रवत्ति खतरनाक काम करने की होती है ;
8. ऐसे बच्चे जिनका बचपन में किसी तरह का शारीरिक शोषण हुआ हो।
नशा मुक्ति केंद्र भोपाल, बिलासपुर, रायपुर, ग्वालियर, जयपुर, लखनऊ, जबलपुर, वड़ोदरा, सागर, होशंगाबाद, सोनभद्र, ललितपुर, टीकमगढ़, इंदौर, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़

Thursday, September 5, 2019

शराबी या एडिक्ट का परिवार भी मानसिक और शारीरिक रूप से बीमार हो जाता है।

एडिक्शन को एक फॅमिली डिसीज़ कहा जाता है र्थात यदि किसी घर में कोई एडिक्ट हो तो वह जो नशा कर रहा होता है वह तो बीमार होता ही है ( विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार किसी मादक पदार्थ पर शारीरिक और मानसिक रूप से निर्भर हो जाना बीमारी है ) उसके साथ रहने वाला उसका परिवार भी धीरे धीरे मानसिक और शारीरिक रूप से बीमार होता जाता है। इसको हम ऐसे समझेंगे जब कोई व्यक्ति एडिक्शन की बीमारी से ग्रसित हो जाता है तो उसका नशा बढ़ता जाता है और उसके द्वारा घर और बाहर बहुत से काण्ड होते रहते है जैसे घर के बाहर लोगों से और और घर में परिजनों से मार-पीट, वाहन दुर्घटना, पुलिस केस, घर में तोड़ फोड़, नौकरी से निकाल दिया जाना, व्यवसाय में नुकसान, घर का सामान बेच देना, कोई ऐसा काम  जिससे घर की आर्थिक स्थिति खराब कर हो जाये आदि और बहुत से उससे होते रहते है इस सब का प्रभाव परिजनों के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा होता है।एडिक्ट के घर वाले हमेशा भय में रहने लगते है उनको यही लगता रहता है कि शराबी घर से निकला है तो पता नहीं बाहर क्या करेगा किसी से लड़ न ले कोई उसको मार न दे या वो किसी को न मर दे एक्सीडेंट न हो जाये या जब लौटेगा तो पता नही क्या तोड़ फोड़ या मार पीट करेगा। इसके अलावा आस पास के लोग हमेशा उनके शराबी का मजाक उड़ाते है जिससे वे समाज से कटते जाते है और लोगों का सामना करने से कतराते है, उनमें हीन भावना आ जाती है और डिप्रेशन का शिकार भी हो जाते है। इस भय, चिंता, हीन भावना और सामाजिक रूप से अलग थलग पड़ने के कारण वे शारीरिक रूप से भी बीमार रहने लगते है उनमें बी पी और ह्रदय रोगों की समस्याएं बढ जाती है। एडिक्ट के उपचार के साथ परिजनों को भी काउन्सलिंग और मानसिक उपचार की आवश्यकता होता है।
नशा मुक्ति केंद्र भोपाल, विदिशा, रायसेन, सीहोर, गुना, अशोकनगर, सागर, होशंगाबाद, हरदा, कटनी, दमोह, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, धार, सूरत, वड़ोदरा, बारां, कोटा, सोनभद्र, सिंगरौली, प्रतापगढ़, नरसिंहगढ़, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, राजस्थान।

Tuesday, September 3, 2019

ड्रग्स अच्छी चीजें है पर उनका दुरूपयोग गलत प्रभाव डाल रहा है।

आज तक हम सुनते आये है कि शराब और ड्रग्स ख़राब चीजें है, आइये आज हम जानते है कि शराब और ड्रग्स आखिर है क्या ?
सबसे पहले ड्रग का अर्थ होता है औषधी या दवाई।

हम कुछ प्रसिद्ध या घातक मादक पदार्थों पर चर्चा करते है जैसे शराब जिसे अल्कोहल भी कहते है जिसे मानव द्वारा बनाई गयी सबसे प्राचीन औषधी कहा जाता है का उपयोग आयुर्वेद में आचार्य सुश्रुत जो पहले सर्जन कहे जाते है द्वारा मरीजों को ऑपरेशन के पूर्व दी जाती थी जिससे उन्हें सर्जरी के दौरान दर्द न हो, इसके अलावा बहुत सी टेबलेट जब हम उनका रैपर फाड़ते है तो जो गंध आती है वो अल्कोहल की होती है और कफ सीरप में भी अल्कोहल का उपयोग होता है।

अफीम जिससे स्मैक और हेरोइन बनते है जो की बहुत घातक ड्रग्स होती है वह सरकार द्वारा दवाई बनाने वाली कंपनियों के लिए उगवायी जाती है। अधिकांश मानसिक रोगों जैसे डिप्रेशन, सिजोफ्रेनिया, इंसोमेनिया, फोबिया आदि में अफीम से बनी दवाइयों द्वारा ही उपचार होता है।
गांजे का उपयोग दर्दनिवारक औषधी बनाने में होता है वहीँ इसे नशे के लिए पीकर बहुत लोग पागल होते है।
 मार्फिन जैसे दर्दनाशक का उपयोग लोग नशे के लिए करते है।
जिन टेबलेट्स को लोग नशे के लिए करते है वे सभी डॉक्टरों द्वारा विभिन्न मानसिक रोगों में दी जाती है।

आज हमारे यहाँ कफ सीरप का उपयोग नशे के लिए अत्यधिक बढ़ गया है लोग एक दिन में 10 बोतल तक पी जाते है जबकि डॉक्टर ये खांसी होने पर एक बार में 2 चम्मच पीने का बोलता है।
आयोडेक्स को नशे के लिए ब्रेड में लगाकर खाया जाता रहा है।
एल एस डी का अविष्कार शराब छुड़ाने की दवा के रूप में किया गया था आज ये एक घातक नशा है।
इसीलिये कह सकते है की सभी ड्रग्स उपयोगी है पर जब रोग के उपचार की जगह मज़े के लिए इनका दुरूपयोग किया जाता है तब यह घातक है।
Nasha mukti bhopal, raisen, sehore, satna, rewa, shahdol, sidhi, umaria, anuppur, guna, ashoknagar, sagar, hoshangabad, harda, khandwa, khargone, bilaspur, korba, sarguja, tikamgarh, chhatarpur, panna, indore, jabalpur, katni, mandla, ujjain, ratlam, mandsaur, sonbhadra, lalitpur, jhansi.

Monday, September 2, 2019

Addiction or alcoholism is a disease, नशे पर नियंत्रण न होना एक बीमारी है।

शराबी या नशैलची (addict) शब्द सुनते ही एक ऐसे आदमी का चेहरा सामने आता है जो सबसे लड़ता रहता है, बिना बात गालियां बकता रहता है, घर का समान बेच रहा होता है, उसका व्यापार बंद हो चुका होता है या नौकरी जा चुकी होती है, उसके बीबी, बच्चे और वो खुद दयनीय स्थिति में होता है। क्या हमे लगता है कि कोई व्यक्ति ऐसी ज़िन्दगी चाहता होगा ? इसका जवाब हम सभी न में ही देंगे।
फिर ऐसा क्यों होता है वो आदमी अपना काम, सम्मान,संबंध और बहुत बार अपना जीवन भी दाव पर लगा होने के बाद भी अपना नशा बंद क्यों नहीं करता है और बहुत से मामलों में तो डॉक्टर ने बोला भी होता है कि यदि और पीयोगे तो मर जाओगे और वो व्यक्ति शराब (alcohol) रोकने की जगह पीकर मर जाता है। 
भारत में लगभग हर वर्ष लगभग 5 लाख लोग शराब के कारण मर जाते है, जबकि उनमें से अधिकतर को डॉक्टरों द्वारा पहले ही बताया चुका होता है कि और पियोगे तो मर जाओगे, ऐसा क्यों है ? इसका जवाब हम लोगों के पास नहीं है क्योंकि अधिकतर लोगों की सोच होती है कि एक शराबी या एडिक्ट(addict) नशामुक्ति चाहता ही नहीं है और दूसरों को परेशान करने के लिए जानबूझकर पीता है या वो मरने के लिए उतावला है, लेकिन ऐसा नहीं है।
इस प्रश्न का जवाब सर्वप्रथम एल्कोहलिक एनोनिमस (Alcoholic Anonymous) नामक संस्था ने 1935 में दिया जिसने कहा कि एडिक्शन (Addiction) एक बीमारी है इसने बताया कि 100 नशा करने वालों में से लगभग 8 से 10 प्रतिशत लोग ऐसे होते है कि वे जब किसी मूड या माइंड बदलने(अल्टर) करने वाले पदार्थ जैसे शराब, गांजा, अफीम या स्मैक के संपर्क में आते है या कहे की उसको उपयोग करना शुरू करते है तो उनके शरीर में एक एलर्जी होती है एलर्जी मतलब एक असामान्य प्रतिक्रिया, जो सामान्यतः सभी को नहीं होती है जिसके कारण उनका शरीर और-और (more & more) नशा मांगने लगता है ,वो चाह कर भी अपने आप को ज्यादा नशा करने से रोक नहीं पाते हैं और ना पूरी तरह से छोड़ पाते है और  उनका नशा लगातार बढ़ता जाता है ।
नशे पर नियंत्रण में कमी और उसका लगातार बढ़ते जाना ही इस बीमारी का मुख्य लक्षण है,नहीं तो कौन आदमी ये सोच के घर से निकलता है कि “इतनी पियूंगा की आज में नाली में गिरूंगा" या “कुछ ऐसा करूंगा की थाने में बंद हो जाऊंगा या पब्लिक मुझ को मारेगी"। कोई नहीं चाहता कि उसका परिवार बिखर जाए, नौकरी, व्यापार और जान चली जाए।
किसी व्यक्ति का जो इस बीमारी से पीडित है नशे पर नियंत्रण ना कर पाना उसका चुनाव नहीं बल्कि उसकी मजबूरी होता है क्योंकि ये एक बढ़ती हुई बीमारी है जो कि धीरे-धीरे बढ़ती है और व्यक्ति का नशा भी धीरे-धीरे बढ़ता जाता है, (उन व्यक्तियों का नशा नहीं बढ़ता है जिनको ये बीमारी नहीं होती है) एक समय ऐसा आता है कि व्यक्ति 24 घंटे नशे में रहने लगता है। 
लगातार अधिक मात्रा में नशा लेने के कारण नशे पर उसकी शारीरिक और मानसिक निर्भरता बढ़ जाती है और वो चाह कर भी अपने नशे को नहीं रोक सकता है, अचानक नशा रोकने पर कुछ अत्यधिक निर्भरता वाले मामलों में नशा रोकने से मृत्यु भी हो जाती है।
इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति का इससे निकल ना पाने का कारण उस पीड़ित व्यक्ति में अपनी समस्या को लेकर अस्वीकार (denial) करना होता है क्योंकि उसने अपने मस्तिष्क में शराबी या नशैलची (alcoholic/addict) की एक पिक्चर बनाई होती है जिसमें वो शुरुआत में अपने को फिट नहीं कर पाता है वो हमेशा अपने से ज्यादा नशा करने वालों से अपने नशे कि तुलना कर के अपनी समस्या को छोटा कर के देखता रहता है, जब तक वो उस स्तर तक ना पहुंच जाए वो मानता ही नहीं है कि उसको नशे से समस्या है। शुरू में वो बोलता है कि में फलाने के जैसे रोज तो नही पीता, फिर जब वो रोज पीने लगता है तो वो किसी अन्य को दिखाकर कहता है कि मैं ढिकाने की तरह सुबह से तो नहीं पीता, और जब वो खुद सबेरे से पीने लगता है तो फिर किसी और उससे ज्यादा वाले से तुलना करने लगता है जैसे कि मैं शराब की दुकान के बाहर पड़ा तो नही रहता। कुल मिलाकर वो किसी अपने से ज्यादा वाले से तुलना कर के अपनी समस्या को नकारता रहता है। 
हालाँकि एक दिन आता है जब वो अपनी समस्या को स्वीकारने लगता है पर तब तक बहुत देर हो जाती है और वो इतना गहरा फंस चुका होता है कि उसके खुद बिना मदद के बाहर आने की सम्भावना बहुत कम हो जाती है।
जब व्यक्ति मानने लगता है कि उसको नशों से समस्या है और वो सामान्य तरीके नशा नहीं कर पाता है तो वह छोड़ना तो चाहता है, किन्तु नशों पर उसकी शारीरिक और मानसिक निर्भरता के कारण उसका शरीर और दिमाग नशा मांगता है ,यह सब कुछ जानते हुए कि और पीना ठीक नहीं है और “मैं जब पीता हूँ तो खुद को ज्यादा पीने से रोक नहीं सकता हूं", उसके दिमाग में नशे कि ओर ले जाने वाला एक विचार होता है जिसको मानसिक खिंचाव (mental obsession) कहते है। 
वो यह होता है कि “आज थोड़ा सा लिमिट में कर लेता हूं और कल से बंद कर दूंगा" ये विचार रोज आता है कि “कल से बंद, आज थोड़ी सी पी लेता हूं,एकदम से छोड़ना ठीक नहीं है" अधिकतर देखा गया है कि पीने जाते समय उसके पास एक ईमानदार विचार होता है कि “आज लिमिट में पियूंगा" किन्तु उसकी बीमारी का जो लक्षण है कि, वो जैसे ही थोड़ा सा नशा करता है फिजिकल एलर्जी के कारण उसका शरीर और-और ( more more ) मांगने लगता है जिस कारण वो स्वयं को ज्यादा पीने से रोक नहीं पाता है। मानसिक खींचाव (mental obsession) के कारण उसका कल कभी नहीं आ पाता है।
लम्बे समय तक नशे करने के बाद व्यक्ति के अंदर अपनी गलतियों के कारण अपराधबोध (guilt ), भय और खुन्नस (resentment) आ जाते है, जिसके कारण वो स्वयं को अकेला (isolate) कर लेता है। वह लोगों और परिस्थितियों का सामना बिना नशे के नहीं कर पाता है। इनके समाधान की भी आवश्यकता होती है क्योंकि नशा बंद करने के बाद ये बातें उसे फिर से नशे की ओर ले जाती हैं।
अमेरिकन मेडिकल एोसिएशन (American Medical Association) ने 1956 में एडिक्शन को बीमारी घोषित किया इसके बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी 1964 में एडिक्शन को बीमारी घोषित किया है तथा भारत सरकार के स्वास्थ्य विभाग भी बीमारियों की सूची में एडिक्शन को F 9 से F 20 तक डाला हुआ है, पर हमारे समाज में इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति की छवि एक खलनायक की होती है।
उसके साथ लोगों की वो सहानुभूति उसके साथ नहीं होती है जो की किसी अन्य बीमारी से पीड़ित व्यक्ति के साथ होती है। हमारे समाज द्वारा इस बीमारी से निपटने का पहला उपचार जूता होता है, अर्थात सबसे पहले उसको पीटा जाता है और जब इससे भी बात नहीं बनती तो कसम, महामृत्युंजय जाप, कालसर्प योग यज्ञ, बाबा, भभूत आदि का दौर चलता है और सबसे आखिर में रामबाण “शादी कर दो ठीक हो जाएगा"।
क्या हम किसी और बीमारी में ये तरीके उपचार के लिए आजमाते है ? नहीं। तो फिर एडिक्शन को हम कैसे इन तरीकों से ठीक कर सकते है? एक शराबी या नशैलची(addict) से उम्मीद की जाती है कि वो इच्छा शक्ति से ठीक हो जाए क्या हम कोई और बीमारी जैसे जुकाम,दस्त या बुखार को इच्छा 
शक्ति से ठीक कर सकते है ? यदि नहीं तो हम एडिक्शन जैसी जानलेवा बीमारी से पीड़ित व्यक्ति से कैसे उम्मीद कर सकते है कि वो इच्छा शक्ति से अपना उपचार कर खुद ठीक हो जाए ? इस समस्या से निपटने के लिए आज सबसे ज्यादा जरूरत समाज को इन पीड़ित व्यक्तियों और इस समस्या के प्रति अपना नजरिया बदलने की है। आइए हम पहले इस समस्या के बारे में जाने और फिर इसका समाधान करें।
राजीव तिवारी, एडिक्शन काउंसलर

Sunday, September 1, 2019

क्यों नशा कर के मज़ा आता है या अच्छा लगता है ?

भारत में लगभग 28 करोड़ लोग किसी न किसी तरह का नशा कर रहे है जिसमे से 16 करोड़ शराब का और 12 करोड़ अन्य ड्रग्स का नशा कर रहे है। आज हम यह जानेंगे की लोग नशा करते क्यों है ? इसका एकमात्र उत्तर यह है कि नशा कर के अच्छा लगता है। जो भी मादक पदार्थ है जैसे शराब, गांजा, अफीम, स्मैक, हीरोइन, कोकीन, स्लीपिंग पिल्स या अन्य इनमें ये गुण होता है कि जब भी हम इनको लेते है तो हमको मजा आता है इसका कारण है जब इन पदार्थों का प्रभाव मस्तिष्क तक पहुँचता है तो हमारे मस्तिष्क के एक भाग जिसे इंग्लिश में अमिग्डाला (amygdala) और हिंदी में प्रमस्तिष्कखंड कहते है यह इमोशन्स जैसे भय, दुःख या ख़ुशी को महसूस करवाता है के द्वारा एक डोपामाइन (dopamine) नाम का हार्मोन रिलीज़ किया जाता है जिसके मस्तिष्क में स्रावित होने से आनंद या मज़ा महसूस होता है। यह कारण है कि लोग मज़ा लेने के लिए नशे में फंसते चले जाते है क्योंकि ये सभी मादक पदार्थ एडिक्टिव होते है जो की शारीरिक और मानसिक निर्भरता रचित करते है। लंबे समय तक नशा लेने के बाद एक एडिक्ट जब तक नशा न कर ले उसके मस्तिष्क में डोपामाइन रिलीज़ ही नही होता है जिस कारण यदि जब तक वह नशा न कर ले उसको बुरा महसूस होता है चाहे कितनी ही ख़ुशी की बात हो। एक शराबी जो शराब पीकर पड़ोसी की शादी में भयंकर डांस करता है यदि उसके घर में हो शादी हो और वह किसी मजबूरीवश शराब न पी पाये तो उसको देखकर ऐसा लगेगा जैसे वो किसी गमी में शरीक होने आया है। मानसिक रूप से नशे पर निर्भर होने के कारण जब तक वह नशा न कर ले उसको बुरा महसूस होता है इस कारण नशा करना उसकी मजबूरी हो जाती है कि वो चाहकर भी नशा नही छोड़ पाता है। नशा मुक्ति भोपाल, सागर, होशंगाबाद, गुना, नरसिंहपुर, बैतूल, खंडवा, खरगौन, मंडला, ललितपुर, झाँसी, सोनभद्र, दमोह, हरदा, मुरैना, दतिया, ग्वालियर, शिवपुरी, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़। 9981665001

बस एक दिन के लिए नशा बंद

नशे से मुक्ति हेतु अमेरिकन फ़ेलोशिप अल्कोहोलिक्स एनोनिमस ने "एक बार में एक दिन" की नई अवधारणा दी जो सबसे सफल साबित हुई है। कहावत ह...